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 हंस कुबेर की साधना

हंस कुबेर की साधना मुकदमो में विजय और अज्ञात दुःख संकट के निवारण के लिए की जाती है ! शनि वार के दिन काले रंग के वस्त्र पे कुबेर यंत्र स्थापत करे और पंचौप्चार पूजन करे !एक लाल रंग का फुल लेकर कुबेर आवाहन मन्त्र पढते हुए हंस कुबेर की स्थापना करे !
 || ॐ हसौं हंस कुबेराये एहः आगच्छ तिष्ठ तिष्ठ स्वाहा || 
1.  साधना में वस्त्र और आसन काला होना चाहिए !
 2. दिन इस के लिए शनिवार ठीक है !
 3. धूप दीप अक्षत फूल नवेद फल आदि से पूजन करे !
 4. दिशा दक्षिण ठीक है !
 5. यंत्र के दायी और कुश काली मिर्च के दाने स्थाप्त करे !
 6. माला रुद्राक्ष की लेनी है !7 , 11 जा 21 माला अपनी सुबिदा अनुसार कर ले !
 7. मिठाई का भोग लगाए !
 8. साधना समाप्ती पे गेंदे का फूल और कुंकुम मिश्र्त अक्षत चढ़ाए और जप स्मरपित कर दे !प्रसाद परिवार में बाँट दे |कुश दिन तक मानसिक जप करते रहे |इस तरह यह साधना पूर्ण हो जाती है !साधना के बाद पूजन सामग्री उसी वस्त्र में बांध कर जल प्रवाह कर दे माला व यंत्र को पूजन स्थान में स्थापित कर दे |
                                             मंत्र –||ॐ हसौं हंस कुबेराये हुं ||

राग कुबेर की साधना

राग कुबेर की साधना विधा प्राप्ति बुद्धि तीक्षण के लिए और संगीत नृत कलाँ और भोतिक और एवं अधियात्मक विधा प्राप्ति के लिए सर्व श्रेष्ठ है !परीक्षा में सफलता के लिए भी यह पूर्ण फलदायी है ! गुरु वार के दिन पीले वस्त्र पे कुबेर यंत्र स्थापत करे !और एक पीला फूल लेकर निम्न मंत्र से कुबेर जी की स्थापना करे|

|| ॐ हसौं राग कुबेराये एहः आगच्छ तिष्ठ तिष्ठ स्वाहा ||

 1. इसे पीले वस्त्र पहन कर पीले आसन पे करे | 2.
 2. दिशा पूर्व की और मुख करे |
 3. माला मोती की श्रेष्ठ है |
 4. 7 ,11 जा 21 माला जप करे |
 5. दिन गुरु वार ठीक है !
 6. यंत्र के साथ ही सफेद चन्दन का एक टुकड़ा स्थापत करे |
 7. फलो का भोग लगाये |
 8. साधना समाप्ती पे सफ़ेद पुष्प सफ़ेद चन्दन अक्षत आदि अर्पित करे और भोग स्व तथा परिवार में बाँट दे |कुश दिनो तक मानसिक जप करते रहे | साधना के बाद यंत्र और माला को छोड़ कर शेष स्मगरी उसी वस्त्र में बांध कर जल प्रवाह कर दे|
                                       मंत्र – || ॐ हसौं राग कुबेराये हुं || 

परम कलियान कारी शिव दर्शन साधना

यह साधना आप किसी भी सोमवार शुरू कर सकते है | आप किसी भी मंदिर अथवा घर में कर सकते है | इस के लिए आपको भगवान शिव का एक चित्र चाहिए और रुद्राश की माला और मंदिर में करे तो शिव जी का पूजन कर शिव लिंग के पास बैठ कर कर सकते है | इसे सुबह / शाम कभी भी किया जा सकता है | चित्र का पूजन धूप दीप नवेद पुष्प फल आदि से करे और घी का दीपक लगाए गुरु पूजन करे फिर गणेश जी का पूजन करे और फिर शिव पूजन करे | इस से पहले चारो दिशयों में ॐ श्रीं ॐ बोल कर जल छिर्क दे इस से दिशा क्षोदन  हो जाता है | फिर 5 वार प्राणायाम करे मतलव सांस ले और छोड़ दे ता जो आंतरिक क्षोदन  हो जाए फिर रुद्राश माला से निमन मंत्र की 21 माला करे यह साधना आप शिवरात्रि से पहले कभी भी शुरू करे 11 दिन पहले कर सकते है | इस से कम न करे जायदा दिन  हो फाइदा ही है और शिवरात्रि तक करे शिवरात्रि को 4 पहर की पुजा करे मतलव रात में 4 वार पुजा की जाती है और हर वार आपको 5 जा 11 माला मंत्र जप करना है | सुबह आरती करे और अपने कार्य कर सकते है | वैसे भी इस मंत्र का जप जायदा से जायदा कर लेना चाहिए इस के बहुत लाभ  मैंने महसूस किए हैं | यह  साधना शिवरात्रि पे ही  नहीं किसी भी सोमवार से शुरू कर 21 दिन में भी  की जा सकती है | इस लिए जो शिवरात्रि पे न कर पाये किसी भी सोमवार शुरू कर कर ले |


मंत्र --- !! ॐ हँस सोहं परम शिवाए नमः  !!

108 का रहस्य

वेदान्त में एक मात्रक विहीन सार्वभौमिक ध्रुवांक 108 का उल्लेख मिलता है जिसका हजारों वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों (वैज्ञानिकों) ने अविष्कार किया था l


मेरी सुविधा के लिए मैं मान लेता हूँ कि, 108 = ॐ (जो पूर्णता का द्योतक है)

प्रकृति में 108 की विविध अभिव्यंजना :

1. सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी/सूर्य का व्यास = 108 = 1 ॐ

150,000,000 km/1,391,000 km = 108 (पृथ्वी और सूर्य के बीच 108 सूर्य सजाये जा सकते हैं)

2. सूर्य का व्यास/ पृथ्वी का व्यास = 108 = 1 ॐ

1,391,000 km/12,742 km = 108 = 1 ॐ
सूर्य के व्यास पर 108 पृथ्वियां सजाई सा सकती हैं .

3. पृथ्वी और चन्द्र के बीच की दूरी/चन्द्र का व्यास = 108 = 1 ॐ
384403 km/3474.20 km = 108 = 1 ॐ
पृथ्वी और चन्द्र के बीच १०८ चन्द्रमा आ सकते हैं .

4. मनुष्य की उम्र 108 वर्षों (1ॐ वर्ष) में पूर्णता प्राप्त करती है .
वैदिक ज्योतिष के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन काल में विभिन्न ग्रहों की 108 वर्षों की अष्टोत्तरी महादशा से गुजरना पड़ता है .

5. एक शांत, स्वस्थ और प्रसन्न वयस्क व्यक्ति 200 ॐ श्वास लेकर एक दिन पूरा करता है .

1 मिनट में 15 श्वास >> 12 घंटों में 10800 श्वास >> दिनभर में 100 ॐ श्वास, वैसे ही रातभर में 100 ॐ श्वास

6. एक शांत, स्वस्थ और प्रसन्न वयस्क व्यक्ति एक मुहुर्त में 4 ॐ ह्रदय की धड़कन पूरी करता है .

1 मिनट में 72 धड़कन >> 6 मिनट में 432 धडकनें >> 1 मुहूर्त में 4 ॐ धडकनें ( 6 मिनट = 1 मुहूर्त)

7. सभी 9 ग्रह (वैदिक ज्योतिष में परिभाषित) भचक्र एक चक्र पूरा करते समय 12 राशियों से होकर गुजरते हैं और 12 x 9 = 108 = 1 ॐ

8. सभी 9 ग्रह भचक्र का एक चक्कर पूरा करते समय 27 नक्षत्रों को पार करते हैं और प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं और 27 x 4 = 108 = 1 ॐ

9. एक सौर दिन 200 ॐ विपल समय में पूरा होता है. (1 विपल = 2.5 सेकेण्ड)

1 सौर दिन (24 घंटे) = 1 अहोरात्र = 60 घटी = 3600 पल = 21600 विपल = 200 x 108 = 200 ॐ विपल

*** 108 का आध्यात्मिक अर्थ ***

1 सूचित करता है ब्रह्म की अद्वितीयता/एकत्व/पूर्णता को

0 सूचित करता है वह शून्य की अवस्था को जो विश्व की अनुपस्थिति में उत्पन्न हुई होती

8 सूचित करता है उस विश्व की अनंतता को जिसका अविर्भाव उस शून्य में ब्रह्म की अनंत अभिव्यक्तियों से हुआ है .
अतः ब्रह्म, शून्यता और अनंत विश्व के संयोग को ही 108 द्वारा सूचित किया गया है .

जिस प्रकार ब्रह्म की शाब्दिक अभिव्यंजना प्रणव ( अ + उ + म् ) है और नादीय अभिव्यंजना ॐ की ध्वनि है उसी प्रकार ब्रह्म की गाणितिक अभिव्यंजना 108 है..!!

मार्जारी तंत्र / बिल्ली तंत्र 

मार्जारी अर्थात्‌ बिल्ली सिंह परिवार का जीव है। केवल आकार का अंतर इसे सिंह से पृथक करता है, अन्यथा यह सर्वांग में, सिंह का लघु संस्करण ही है। मार्जारी अर्थात्‌ बिल्ली की दो श्रेणियाँ होती हैं- पालतू और जंगली। जंगली को वन बिलाव कहते हैं। यह आकार में बड़ा होता है, जबकि घरों में घूमने वाली बिल्लियाँ छोटी होती हैं। वन बिलाव को पालतू नहीं बनाया जा सकता, किन्तु घरों में घूमने वाली बिल्लियाँ पातलू हो जाती हैं। अधिकतर यह काले रंग की होती हैं, किन्तु सफेद, चितकबरी और लाल (नारंगी) रंग की बिल्लियाँ भी देखी जाती हैं।

 

अस्तु, घरों में घूमने वाली बिल्ली (मादा) भी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त कराने में सहायक होती है, किन्तु यह तंत्र प्रयोग दुर्लभ और अज्ञात होने के कारण सर्वसाधारण के लिए लाभकारी नहीं हो पाता। वैसे यदि कोई व्यक्ति इस मार्जारी यंत्र का प्रयोग करे तो निश्चित रूप से वह लाभान्वित हो सकता है।

 

गाय, भैंस, बकरी की तरह लगभग सभी चौपाए मादा पशुओं के पेट से प्रसव के पश्चात्‌ एक झिल्ली जैसी वस्तु निकलती है। वस्तुतः इसी झिल्ली में गर्भस्थ बच्चा रहता है। बच्चे के जन्म के समय वह भी बच्चे के साथ बाहर आ जाती है। यह पॉलिथीन की थैली की तरह पारदर्शी लिजलिजी, रक्त और पानी के मिश्रण से तर और देखने में घृणित होती है। सामान्यतः इसे नाल कहते हैं।

 

इस नाल को तांत्रिक साधना में बहुत महत्व प्राप्त है। स्त्री की नाल का उपयोग वन्ध्या अथवा मृतवत्सा स्त्रियों के लिए परम हितकर माना गया है। वैसे अन्य पशुओं की नाल के भी विविध उपयोग होते हैं। यहाँ केवल मार्जारी (बिल्ली) की नाल का ही तांत्रिक प्रयोग लिखा जा रहा है, जिसे सुलभ हो, इसका प्रयोग करके लक्ष्मी की कृपा प्राप्त कर सकता है।

 

जब पालतू बिल्ली का प्रसव काल निकट हो, उसके लिए रहने और खाने की ऐसी व्यवस्था करें कि वह आपके कमरे में ही रहे। यह कुछ कठिन कार्य नहीं है, प्रेमपूर्वक पाली गई बिल्लियाँ तो कुर्सी, बिस्तर और गोद तक में बराबर मालिक के पास बैठी रहती हैं। उस पर बराबर निगाह रखें। जिस समय वह बच्चों को जन्म दे रही हो, सावधानी से उसकी रखवाली करें। बच्चों के जन्म के तुरंत बाद ही उसके पेट से नाल (झिल्ली) निकलती है और स्वभावतः तुरंत ही बिल्ली उसे खा जाती है। बहुत कम लोग ही उसे प्राप्त कर पाते हैं।

सर्वशक्ति सम्पन्न माँ बगलामुखी साधना

यह विद्या शत्रु का नाश करने में अद्भुत है, वहीं कोर्ट, कचहरी में, वाद-विवाद में भी विजय दिलाने में सक्षम है। इसकी साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है। उसके मुख का तेज इतना हो जाता है कि उससे आँखें मिलाने में भी व्यक्ति घबराता है। सामने वाले विरोधियों को शांत करने में इस विद्या का अनेक राजनेता अपने ढंग से इस्तेमाल करते हैं। यदि इस विद्या का सदुपयोग किया जाए तो देशहित होगा।

मंत्र शक्ति का चमत्कार हजारों साल से होता आ रहा है। कोई भी मंत्र आबध या किलित नहीं है यानी बँधे हुए नहीं हैं। सभी मंत्र अपना कार्य करने में सक्षम हैं। मंत्र का सही विधि द्वारा जाप किया जाए तो वह मंत्र निश्चित रूप से सफलता दिलाने में सक्षम होता है।

हम यहाँ पर सर्वशक्ति सम्पन्न बनाने वाली सभी शत्रुओं का शमन करने वाली, कोर्ट में विजय दिलाने वाली, अपने विरोधियों का मुँह बंद करने वाली माँ बगलामुखी की आराधना का सही प्रस्तुतीकरण दे रहे हैं। हमारे पाठक इसका प्रयोग कर लाभ उठाने में समर्थ होंगे, ऐसी हमारी आशा है।

यह विद्या शत्रु का नाश करने में अद्भुत है, वहीं कोर्ट, कचहरी में, वाद-विवाद में भी विजय दिलाने में सक्षम है। इसकी साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है।

 इस साधना में विशेष सावधानियाँ रखने की आवश्यकता होती है जिसे हम यहाँ पर देना उचित समझते हैं। इस साधना को करने वाला साधक पूर्ण रूप से शुद्ध होकर (तन, मन, वचन) एक निश्चित समय पर पीले वस्त्र पहनकर व पीला आसन बिछाकर, पीले पुष्पों का प्रयोग कर, पीली (हल्दी) की 108 दानों की माला द्वारा मंत्रों का सही उच्चारण करते हुए कम से कम 60 माला का नित्य जाप 21 दिनों तक या कार्यसिद्ध होने तक करे या फिर नित्य 1008 बार मंत्र जाप करने से भी आपको अभीष्ट सिद्ध की प्राप्ति होगी।

 आँखों में तेज बढ़ेगा, आपकी ओर कोई निगाह नहीं मिला पाएगा एवं आपके सभी उचित कार्य सहज होते जाएँगे। खाने में पीला खाना व सोने के बिछौने को भी पीला रखना साधना काल में आवश्यक होता है वहीं नियम-संयम रखकर ब्रह्मचारीय होना भी आवश्यक है।

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Note - नीचे मंत्र साधनायें लिखी गई है कोई भी मंत्र साधना पढ़ने के लिये उस मंत्र पर क्लिक करे ☟

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