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आपका मूलांक और व्यवसाय

जिनका जन्म 1, 10, 19, 28 तारीख को हुआ है, उनका मूलांक एक होता है। एक अंक सूर्य का प्रतिनिधित्व करता है। एक अंक से प्रभावित व्यक्ति किसी के नियंत्रण में काम करना पसंद नहीं करते हैं। आजीविका की दृष्टि से आपके लिए दवा, ऊन, धान्य, सोना, मोती आदि का व्यापार अनुकूल रहेगा तथा इन क्षेत्रों में आप विशेष सफल होंगे।

जिनका जन्म 2, 11, 20, 23 तारीख को हुआ है, उनका मूलांक 2 होता है। अंक 2 का स्वामी चंद्रमा है। मूलांक दो वाले कोमल तथा बहुत ही सुंदर होते हैं। ये विनम्र, कल्पनाशील और भावुक होते हैं। आजीविका की दृष्टि से आपके लिए मोती, कृषि, बच्चों के खिलौने, फैंसी स्टोर, रेडीमेड स्टोर आदि का व्यापार विशेष सफलतादायक होगा।

जिनका जन्म 3, 12, 21, 30 तारीख को हुआ है, उनका मूलांक 3 होता है। अंक 3 का प्रतिनिधि ग्रह बृहस्पति है। तीन अंक वाले जातक निश्चित रू प से महत्वाकांक्षी तथा अनुशासनप्रिय होते हैं। अध्यापन वृत्ति तथा स्टेशनरी आदि के व्यापार से आजीविका प्राप्त होती है। 3 मूलांक के व्यक्ति अधिकांशत: सरकारी संस्थाओं में उच्च पदासीन देखे जाते हैं।

जिन व्यक्तियों का जन्म 4, 13, 22, 31 तारीख को होता है उनका मूलांक 4 होता है। भारतीय पद्धति के अनुसार इसका स्वामी ग्रह राहु है। इस अंक वाले व्यक्ति सात्विक ह्वदय एवं उदार प्रवृत्ति के होते हैं। ये स्पष्टवादी होते हैं। जीवन में प्राय: विरोधियों का सामना करना पड़ता है। आजीविका की दृष्टि से आपके लिए रेलवे, वायुयान, खान, तकनीक कार्य, पुरातत्व, ज्योतिष आदि कार्य अनुकूल रहेंगे।

जिनका जन्म 5, 14, 23 तारीख को होता है उनका मूलांक 5 होता है। अंक 5 का अधिष्ठाता बुध ग्रह है। पांच अंक वाले जातक वाक्पटु, व्यापारिक मानसिक वाले, पुष्ट शरीर व ठिगने कद के होते हैं। आजीविका की दृष्टि से आपके लिए लकड़ी का कारखाना, फर्नीचर, ज्योतिष, वैद्यक आदि कार्य सफलतादायक होंगे।

जिनका जन्म 6, 15, 24 तारीख को होता है उनका मूलांक 6 होता है। अंक 6 का स्वामी शुक्र है। इस अंक वाले लोगों में आकर्षण शक्ति विशेष होती है। ये लोकप्रिय होते हैं। आजीविका की दृष्टि से आपके लिए चौपायों के खरीदने-बेचने का कार्य, गुड़, चावल, किराना का व्यापार अथवा फैंसी स्टोर के व्यापार में सफलता प्राप्त होती है।

जिन व्यक्तियों का जन्म 7, 16, 25 तारीख को होता है उनका मूलांक 7 होता है। 7 अंक से प्रभावित जातक उग्र स्वभाव के, मौलिकतावादी, प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी होते हैं। 7 अंक का अधिष्ठाता नेपच्यून [वरूण] ग्रह है। आजीविका की दृष्टि से आप दवा, घास, स्वर्ण, सेना में कार्य सफलतादायक होगा।

 

जिन व्यक्तियों का जन्म 8, 17, 26 तारीख को होता है उनका मूलांक 8 होता है। 8 अंक से प्रभावित जातक स्वभाव से हर बात की गहराई में जाने वाले होते हैं। ऎसे व्यक्ति जीवकाल में महžवपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। अंक 8 का स्वामी शनि है। आजीविका की दृष्टि से आप लोहे का व्यापार, तिल, तेल, ऊन आदि के व्यापार में विशेष प्रगति पा सकते हैं।

जिन व्यक्तियों का जन्म 9, 18, 27 तारीख को होता है उनका मूलांक 9 होता है। 9 अंक का स्वामी मंगल है। 9 अंक से प्रभावित जातक तेजस्वी व उग्र स्वभाव के होते हैं। आजीविका की दृष्टि से आप तांबा व पीतल के बर्तनों की दुकान एवं कोयला आदि के व्यापार में, सोना, आदि क्षेत्रों में शीघ्र सफलता प्राप्त कर सकते हैं। 

 

राशि के अनुरूप करें मंत्र जाप  

व्यक्ति यदि अपनी राशि के अनुकूल मंत्र का जाप करे तो लाभकारी होता है। इन मंत्रों का कोई विशेष विधान नहीं है लेकिन सामान्य सहज भाव से स्नान के पश्चात अपने पूजा घर या घर में शुद्ध स्थान का चयन कर प्रतिदिन धूप-दीप के पश्चात ऊन या कुशासन पर बैठें एवं अपनी शक्ति अनुरूप एक, तीन या पाँच माला का जाप करें।

 

निश्चित ही इसका प्रभाव होगा, जिससे धन, यश और समृद्धि की वृद्धि होगी।

 

राशि - लक्ष्मी मंत्र

 

मेष - ॐ ऐं क्लीं सौं:

 

वृषभ - ॐ ऐं क्लीं श्रीं

 

मिथुन - ॐ क्लीं ऐं सौं:

 

कर्क - ॐ ऐं क्लीं श्रीं

 

सिंह - ॐ ह्रीं श्रीं सौं:

 

कन्या - ॐ श्रीं ऐं सौं:

 

तुला - ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं

 

वृश्चिक - ॐ ऐं क्लीं सौं:

 

धनु - ॐ ह्रीं क्लीं सौं:

 

मकर - ॐ ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं सौं:

 

कुंभ - ॐ ह्रीं ऐं क्लीं श्रीं

 

मीन - ॐ ह्रीं क्लीं सौं:

 

 चमत्कारी बीसा यंत्र  

तंत्र शास्त्र में चमत्कारी बीसा यंत्र का उल्लेख मिलता है। इस यंत्र के कई स्वरूप हैं, जो धन, समृद्धि, वैभव प्राप्ति के लिए, तनाव, कष्ट, विपदाओं से बचने के लिए और रोग-व्याधियों से मुक्ति के लिए लाभदायक रहते हैं। इन यंत्रों को शुभ मुहूर्त में शास्त्रोक्त विधि से तैयार करके और अभिमंत्रित द्वारा सिद्ध करके यदि पूजा-अर्चना की जाए तो मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

 

बीसा यंत्र को रवि-पुष्य, रवि-हस्त, गुरु-पुष्य, नवरात्रि, धनतेरस, दीपावली या सूर्य-चंद्रग्रहण में लाभ के चौघड़िए में शास्त्रोक्त विधि से तैयार किया जाना चाहिए। शुभ मुहूर्त में अनार की डाली तोड़कर पत्थर पर घिसकर कलम तैयार करनी चाहिए। इस यंत्र को भोजपत्र पर, भोजपत्र की अनुपलब्धि में कोरे कागज पर अष्टगंध स्याही (अर्थात- केसर, कस्तूरी, गोरोचन, लाल चंदन, सफेद चंदन, कपूर, अगर-तगर और कुमकुम मिलाकर बनाई स्याही), यदि यह उपलब्ध न हो तो केसर की स्याही से अंकित करना चाहिए।

 

इस यंत्र का विधिवत पूजन कर मंत्रोच्चारण के साथ ध्यान करने पर कार्य सिद्धि तथा विपत्ति निवारण होता है। बीसा यंत्रों की आकृतियाँ निम्नानुसार दी जा रही हैं- 1. धन संपत्ति, व्यापार में सफलता एवं निरंतर उन्नति करने के लिए बीसा यंत्र :

बीसा यंत्र को रवि-पुष्य, रवि-हस्त, गुरु-पुष्य, नवरात्रि, धनतेरस, दीपावली या सूर्य-चंद्रग्रहण में लाभ के चौघड़िए में शास्त्रोक्त विधि से तैयार किया जाना चाहिए। शुभ मुहूर्त में अनार की डाली तोड़कर पत्थर पर घिसकर कलम तैयार करनी चाहिए।

दीपावली के पूर्व आने वाले पुष्य नक्षत्र में, धनतेरस या दीपावली के दिन लाभ के चौघड़िए में घर में, पूजागृह में, मंदिर, दुकान या व्यापार के स्थान पर ईशान कोण की पश्चिम मुखी दीवार पर शुद्ध घी-सिंदूर से इन्हें अंकित करना चाहिए। इससे सुख-समृद्धि एवं वैभव बना रहता है। शुभ मुहूर्त में 'ओम्‌ हीं हीं श्रीं श्रीं क्रीं क्रीं स्थिरां ओम्‌' का 11 बार जाप करें, साथ में लक्ष्मीजी एवं गणेशजी के अष्टकम्‌ स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। इसके साथ लक्ष्मीजी-गणेशजी की पूजा करें तो उत्तम रहेगा।

समस्या, तनाव, विपत्ति दूर करने के लिए तथा शत्रुनाश हेतु निम्नांकित बीसा यंत्रों को विधिवत तैयार करके पूजा-आराधना करनी चाहिए। साथ ही दुर्गा देवी के दुर्गा स्तोत्र का वाचन शीघ्र लाभ करता है।

कहावत है-

'वो करे यंत्र बीसा,  जो कर न सके जगदीशा'

 

 तंत्र-मंत्र में उपयोगी कृष्णा हरिद्रा  

जड़ी-बूटी अनेकानेक रोगों में कारगर साबित होती हैं। कुछ जड़ी ऐसी भी होती हैं जो विधि-विधानपूर्वक लाई जाए तो आश्चर्यजनक परिणाम देती हैं। सामान्य रूप सें हल्दी का रंग पीला होता है। इसकी एक जाति काले (श्याम वर्ण) रंग की होती है। उसे ही कृष्णा हरिद्रा या काली हल्दी के नाम से पहचाना जाता है।

 

जिस प्रकार पूजा-पाठ-उबटन, शादी-ब्याह एवं अनेक मांगलिक कार्यों में हल्दी का प्रयोग होता है, वहीं काली हल्दी का प्रयोग भी तांत्रिक-मांत्रिक कार्यों में किया जाता है। काली हल्दी की गाँठ में एक विशेष सुगंध पाई जाती है। इसे नर कपूर के नाम से भी जाना जाता है। इसे किसी शुभ-मुहूर्त में विधि-विधान से पूजन कर अभिमंत्रित कर लाएँ। यह धन-सौभाग्य की वृद्धि करने वाली होती है। इसमें दुष्प्रभावों को शमन करने की शक्ति होती है। 

 

 ध्यान में होने वाले अनुभव 

"ध्यान में होने वाले अनुभव साधकों को ध्यान के दौरान कुछ एक जैसे एवं कुछ अलग प्रकार के अनुभव होते हैं. अनेक साधकों के ध्यान में होने वाले अनुभव एकत्रित कर यहाँ वर्णन कर रहे हैं ताकि नए साधक अपनी साधना में अपनी साधना में यदि उन अनुभवों को अनुभव करते हों तो वे अपनी साधना की प्रगति, स्थिति व बाधाओं को ठीक प्रकार से जान सकें और स्थिति व परिस्थिति के अनुरूप निर्णय ले सकें.
१. भौहों के बीच आज्ञा चक्र में ध्यान लगने पर पहले काला और फिर नीला रंग दिखाई देता है. फिर पीले रंग की परिधि वाले नीला रंग भरे हुए गोले एक के अन्दर एक विलीन होते हुए दिखाई देते हैं. एक पीली परिधि वाला नीला गोला घूमता हुआ धीरे-धीरे छोटा होता हुआ अदृश्य हो जाता है और उसकी जगह वैसा ही दूसरा बड़ा गोला दिखाई देने लगता है. इस प्रकार यह क्रम बहुत देर तक चलता रहता है. साधक यह सोचता है इक यह क्या है, इसका अर्थ क्या है ? इस प्रकार दिखने वाला नीला रंग आज्ञा चक्र का एवं जीवात्मा का रंग है. नीले रंग के रूप में जीवात्मा ही दिखाई पड़ती है. पीला रंग आत्मा का प्रकाश है जो जीवात्मा के आत्मा के भीतर होने का संकेत है. इस प्रकार के गोले दिखना आज्ञा चक्र के जाग्रत होने का लक्षण है. इससे भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों प्रत्यक्षा दीखने लगते है और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के पूर्वाभास भी होने लगते हैं. साथ ही हमारे मन में पूर्ण आत्मविश्वास जाग्रत होता है जिससे हम असाधारण कार्य भी शीघ्रता से संपन्न कर लेते हैं. 

२. कुण्डलिनी जागरण का अनुभव :- कुण्डलिनी वह दिव्य शक्ति है जिससे सब जीव जीवन धारण करते हैं, समस्त कार्य करते हैं और फिर परमात्मा में लीन हो जाते हैं. अर्थात यह ईश्वर की साक्षात् शक्ति है. यह कुदालिनी शक्ति सर्प की तरह साढ़े तीन फेरे लेकर शारीर के सबसे नीचे के चक्र मूलाधार चक्र में स्थित होती है. जब तक यह इस प्रकार नीचे रहती है तब तक हम सांसारिक विषयों की ओर भागते रहते हैं. परन्तु जब यह जाग्रत होती है तो उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि कोई सर्पिलाकार तरंग है जिसका एक छोर मूलाधार चक्र पर जुदा हुआ है और दूसरा छोर रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ घूमता हुआ ऊपर उठ रहा है. यह बड़ा ही दिव्य अनुभव होता है. यह छोर गति करता हुआ किसी भी चक्र पर रुक सकता है. जब कुण्डलिनी जाग्रत होने लगती है तो पहले मूलाधार चक्र में स्पंदन का अनुभव होने लगता है. यह स्पंदन लगभग वैसा ही होता है जैसे हमारा कोई अंग फड़कता है. फिर वह कुण्डलिनी तेजी से ऊपर उठती है और किसी एक चक्र पर जाकर रुक जाती है.

जिस चक्र पर जाकर वह रूकती है उसको व उससे नीचे के चक्रों को वह स्वच्छ कर देती है, यानि उनमें स्थित नकारात्मक उर्जा को नष्ट कर देती है. इस प्रकार कुण्डलिनी जाग्रत होने पर हम सांसारिक विषय भोगों से विरक्त हो जाते हैं और ईश्वर प्राप्ति की ओर हमारा मन लग जाता है. इसके अतिरिक्त हमारी कार्यक्षमता कई गुना बढ जाती है. कठिन कार्य भी हम शीघ्रता से कर लेते हैं. 

३. कुण्डलिनी जागरण के लक्षण : कुण्डलिनी जागरण के सामान्य लक्षण हैं : ध्यान में ईष्ट देव का दिखाई देना या हूं हूं या गर्जना के शब्द करना, गेंद की तरह एक ही स्थान पर फुदकना, गर्दन का भाग ऊंचा उठ जाना, सर में चोटी रखने की जगह यानि सहस्रार चक्र पर चींटियाँ चलने जैसा लगना, कपाल ऊपर की तरफ तेजी से खिंच रहा है ऐसा लगना, मुंह का पूरा खुलना और चेहरे की मांसपेशियों का ऊपर खींचना और ऐसा लगना कि कुछ है जो ऊपर जाने की कोशिश कर रहा है. 

४. एक से अधिक शरीरों का अनुभव होना : कई बार साधकों को एक से अधिक शरीरों का अनुभव होने लगता है. यानि एक तो यह स्थूल शारीर है और उस शरीर से निकलते हुए २ अन्य शरीर. तब साधक कई बार घबरा जाता है. वह सोचता है कि ये ना जाने क्या है और साधना छोड़ भी देता है. परन्तु घबराने जैसी कोई बात नहीं होती है. एक तो यह हमारा स्थूल शरीर है. दूसरा शरीर सूक्ष्म शरीर (मनोमय शरीर) कहलाता है तीसरा शरीर कारण शारीर कहलाता है. सूक्ष्म शरीर या मनोमय शरीर भी हमारे स्थूल शारीर की तरह ही है यानि यह भी सब कुछ देख सकता है, सूंघ सकता है, खा सकता है, चल सकता है, बोल सकता है आदि. परन्तु इसके लिए कोई दीवार नहीं है यह सब जगह आ जा सकता है क्योंकि मन का संकल्प ही इसका स्वरुप है. तीसरा शरीर कारण शरीर है इसमें शरीर की वासना के बीज विद्यमान होते हैं. मृत्यु के बाद यही कारण शरीर एक स्थान से दुसरे स्थान पर जाता है और इसी के प्रकाश से पुनः मनोमय व स्थूल शरीर की प्राप्ति होती है अर्थात नया जन्म होता है. इसी कारण शरीर से कई सिद्ध योगी परकाय प्रवेश में समर्थ हो जाते हैं."

"५. दो शरीरों का अनुभव होना :- अनाहत चक्र (हृदय में स्थित चक्र) के जाग्रत होने पर, स्थूल शरीर में अहम भावना का नाश होने पर दो शरीरों का अनुभव होता ही है. कई बार साधकों को लगता है जैसे उनके शरीर के छिद्रों से गर्म वायु निकर्लर एक स्थान पर एकत्र हुई और एक शरीर का रूप धारण कर लिया जो बहुत शक्तिशाली है. उस समय यह स्थूल शरीर जड़ पदार्थ की भांति क्रियाहीन हो जाता है. इस दूसरे शरीर को सूक्ष्म शरीर या मनोमय शरीर कहते हैं. कभी-कभी ऐसा लगता है कि वह सूक्ष्म शरीर हवा में तैर रहा है और वह शरीर हमारे स्थूल शरीर की नाभी से एक पतले तंतु से जुड़ा हुआ है. कभी ऐसा भी अनुभव अनुभव हो सकता है कि यह सूक्ष्म शरीर हमारे स्थूल शरीर से बाहर निकल गया मतलब जीवात्मा हमारे शरीर से बाहर निकल गई और अब स्थूल शरीर नहीं रहेगा, उसकी मृत्यु हो जायेगी. ऐसा विचार आते ही हम उस सूक्ष्म शरीर को वापस स्थूल शरीर में लाने की कोशिश करते हैं परन्तु यह बहुत मुश्किल कार्य मालूम देता है. "स्थूल शरीर मैं ही हूँ" ऐसी भावना करने से व ईश्वर का स्मरण करने से वह सूक्ष्म शरीर शीघ्र ही स्थूल शरीर में पुनः प्रवेश कर जाता है. कई बार संतों की कथाओं में हम सुनते हैं कि वे संत एक साथ एक ही समय दो जगह देखे गए हैं, ऐसा उस सूक्ष्म शरीर के द्वारा ही संभव होता है. उस सूक्ष्म शरीर के लिए कोई आवरण-बाधा नहीं है, वह सब जगह आ जा सकता है. 

६. दिव्य ज्योति दिखना :- सूर्य के सामान दिव्य तेज का पुंज या दिव्य ज्योति दिखाई देना एक सामान्य अनुभव है. यह कुण्डलिनी जागने व परमात्मा के अत्यंत निकट पहुँच जाने पर होता है. उस तेज को सहन करना कठिन होता है. लगता है कि आँखें चौंधिया गईं हैं और इसका अभ्यास न होने से ध्यान भंग हो जाता है. वह तेज पुंज आत्मा व उसका प्रकाश है. इसको देखने का नित्य अभ्यास करना चाहिए. समाधि के निकट पहुँच जाने पर ही इसका अनुभव होता है. 

७. ध्यान में कभी ऐसे लगता है जैसे पूरी पृथ्वी गोद में रखी हुई है या शरीर की लम्बाई बदती जा रही है और अनंत हो गई है, या शरीर के नीचे का हिस्सा लम्बा होता जा रहा है और पूरी पृथ्वी में व्याप्त हो गया है, शरीर के कुछ अंग जैसे गर्दन का पूरा पीछे की और घूम जाना, शरीर का रूई की तरह हल्का लगना, ये सब ध्यान के समय कुण्डलिनी जागरण के कारण अलग-अलग चक्रों की प्रतिभाएं प्रकट होने के कारण होता है. परन्तु साधक को इनका उपयोग नहीं करना चाहिए, केवल परमात्मा की प्राप्ति को ही लक्ष्य मानकर ध्यान करते रहना चाहिए. इन प्रतिभाओं पर ध्यान न देने से ये पुनः अंतर्मुखी हो जाती हैं. 

८. कभी-कभी साधक का पूरा का पूरा शरीर एक दिशा विशेष में घूम जाता है या एक दिशा विशेष में ही मुंह करके बैठने पर ही बहुत अच्छा ध्यान लगता है अन्य किसी दिशा में नहीं लगता. यदि अन्य किसी दिशा में मुंह करके बैठें भी, तो शरीर ध्यान में अपने आप उस दिशा विशेष में घूम जाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आपके ईष्ट देव या गुरु का निवास उस दिशा में होता है जहाँ से वे आपको सन्देश भेजते हैं. कभी-कभी किसी मंत्र विशेष का जप करते हुए भी ऐसा महसूस हो सकता है क्योंकि उस मंत्र देवता का निवास उस दिशा में होता है, और मंत्र जप से उत्पन्न तरंगें उस देवता तक उसी दिशा में प्रवाहित होती हैं, फिर वहां एकत्र होकर पुष्ट (प्रबल) हो जाती हैं और इसी से उस दिशा में खिंचाव महसूस होता है. 

९. संसार (दृश्य) व शरीर का अत्यंत अभाव का अनुभव :- साधना की उच्च स्थिति में ध्यान जब सहस्रार चक्र पर या शरीर के बाहर स्थित चक्रों में लगता है तो इस संसार (दृश्य) व शरीर के अत्यंत अभाव का अनुभव होता है. यानी एक शून्य का सा अनुभव होता है. उस समय हम संसार को पूरी तरह भूल जाते हैं (ठीक वैसे ही जैसे सोते समय भूल जाते हैं). सामान्यतया इस अनुभव के बाद जब साधक का चित्त वापस नीचे लौटता है तो वह पुनः संसार को देखकर घबरा जाता है, क्योंकि उसे यह ज्ञान नहीं होता कि उसने यह क्या देखा है? वास्तव में इसे आत्मबोध कहते हैं. यह समाधि की ही प्रारम्भिक अवस्था है अतः साधक घबराएं नहीं, बल्कि धीरे-धीरे इसका अभ्यास करें. यहाँ अभी द्वैत भाव शेष रहता है व साधक के मन में एक द्वंद्व पैदा होता है. वह दो नावों में पैर रखने जैसी स्थिति में होता है, इस संसार को पूरी तरह अभी छोड़ा नहीं और परमात्मा की प्राप्ति अभी हुई नहीं जो कि उसे अभीष्ट है. इस स्थिति में आकर सांसारिक कार्य करने से उसे बहुत क्लेश होता है क्योंकि वह परवैराग्य को प्राप्त हो चुका होता है और भोग उसे रोग के सामान लगते हैं, परन्तु समाधी का अभी पूर्ण अभ्यास नहीं है. इसलिए साधक को चाहिए कि वह धैर्य रखें व धीरे-धीरे समाधी का अभ्यास करता रहे और यथासंभव सांसारिक कार्यों को भी यह मानकर कि गुण ही गुणों में बारात रहे हैं, करता रहे और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखे. साथ ही इस समय उसे तत्त्वज्ञान की भी आवश्यकता होती है जिससे उसके मन के समस्त द्वंद्व शीघ्र शांत हो जाएँ. इसके लिए योगवाशिष्ठ (महारामायण) नामक ग्रन्थ का विशेष रूप से अध्ययन व अभ्यास करें. उमें बताई गई युक्तियों "जिस प्रकार समुद्र में जल ही तरंग है, सुवर्ण ही कड़ा/कुंडल है, मिट्टी ही मिट्टी की सेना है, ठीक उसी प्रकार ईश्वर ही यह जगत है." का बारम्बार चिंतन करता रहे तो उसे शीघ्र ही परमत्मबोध होता है, सारा संसार ईश्वर का रूप प्रतीत होने लगता है और मन पूर्ण शांत हो जाता है. 

१०. चलते-फिरते उठते बैठते यह महसूस होना कि सब कुछ रुका हुआ है, शांत है, "मैं नहीं चल रहा हूँ, यह शरीर चल रहा है", यह सब आत्मबोध के लक्षण हैं यानि परमात्मा के अत्यंत निकट पहुँच जाने पर यह अनुभव होता है. 

११. कई साधकों को किसी व्यक्ति की केवल आवाज सुनकर उसका चेहरा, रंग, कद, आदि का प्रत्यक्ष दर्शन हो जाता है और जब वह व्यक्ति सामने आता है तो वह साधक कह उठता है कि, "अरे! यही चेहरा, यही कद-काठी तो मैंने आवाज सुनकर देखी थी, यह कैसे संभव हुआ कि मैं उसे देख सका?" वास्तव में धारणा के प्रबल होने से, जिस व्यक्ति की ध्वनि सुनी है, साधक का मन या चित्त उस व्यक्ति की भावना का अनुसरण करता हुआ उस तक पहुँचता है और उस व्यक्ति का चित्र प्रतिक्रिया रूप उसके मन पर अंकित हो जाता है. इसे दिव्या दर्शन भी कहते हैं. 

१२. आँखें बंद होने पर भी बाहर का सब कुछ दिखाई देना, दीवार-दरवाजे आदि के पार भी देख सकना, बहुत दूर स्थित जगहों को भी देख लेना, भूत-भविष्य की घटनाओं को भी देख लेना, यह सब आज्ञा चक्र (तीसरी आँख) के खुलने पर अनुभव होता है. 

१३. अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों के मन की बात जान लेना या दूर स्थित व्यक्ति क्या कर रहा है (दु:खी है, रो रहा है, आनंद मना रहा है, हमें याद कर रहा है, कही जा रहा है या आ रहा है वगैरह) इसका अभ्यास हो जाना और सत्यता जांचने के लिए उस व्यक्ति से उस समय बात करने पर उस आभास का सही निकलना, यह सब दूसरों के साथ अपने चित्त को जोड़ देने पर होता है. यह साधना में बाधा उत्पन्न करने वाला है क्र्योकि दूसरों के द्वारा इस प्रकार साधक का मन अपनी और खींचा जाता है और ईश्वर प्राप्ति के अभ्यास के लिए कम समय मिलता है और अभय कम हो पाता है जिससे साधना दीरे-धीरे क्षीण हो जाती है. इसलिए इससे बचना चाहिए. दूसरों के विषय में सोचना छोड़ें. अपनी साधना की और ध्यान दें. इससे कुछ ही दिनों में यह प्रतिभा अंतर्मुखी हो जाती है और साधना पुनः आगे बदती है. 

१४. ईश्वर के सगुण स्वरुप का दर्शन :- ईश्वर के सगुण रूप की साधना करने वाले साधानकों को, भगवान का वह रूप कभी आँख वंद करने या कभी बिना आँख बंद किये यानी खुली आँखों से भी दिखाई देने का आभास सा होने लगता है या स्पष्ट दिखाई देने लगता है. उस समय उनको असीम आनंद की प्राप्ति होती है. परन्तु मन में यह विश्वास नहीं होता कि ईश्वर के दर्शन किये हैं. वास्तव में यह सवितर्क समाधि की सी स्थिति है जिसमे ईश्वर का नाम, रूप और गुण उपस्थित होते हैं. ऋषि पतंजलि ने अपने योगसूत्र में इसे सवितर्क समाधि कहा है. ईश्वर की कृपा होने पर (ईष्ट देव का सान्निध्य प्राप्त होने पर) वे साधक के पापों को नष्ट करने के लिए इस प्रकार चित्त में आत्मभाव से उपस्थित होकर दर्शन देते हैं और साधक को अज्ञान के अन्धकार से ज्ञान के प्रकाश की और खींचते हैं. इसमें ईश्वर द्वारा भक्त पर शक्तिपात भी किया जाता है जिससे उसे परमानन्द की अनुभूति होती है. कई साधकों/भक्तों को भगवान् के मंदिरों या उन मंदिरों की मूर्तियों के दर्शन से भी ऐसा आनंद प्राप्त होता है. ईष्ट प्रबल होने पर ऐसा होता है. यह ईश्वर के सगुन स्वरुप के साक्षात्कार की ही अवस्था है इसमें साधक कोई संदेह न करें. 

१५. कई सगुण साधक ईश्वर के सगुन स्वरुप को उपरोक्त प्रकार से देखते भी हैं और उनसे वार्ता भी करने का प्रयास करते हैं. इष्ट प्रबल होने पर वे बातचीत में किये गए प्रश्नों का उत्तर प्रदान करते हैं, या किसी सांसारिक युक्ति द्वारा साधक के प्रश्न का हल उपस्थित कर देते हैं. यह ईष्ट देव की निकटता व कृपा प्राप्त होने पर होता है. इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए. साधना में आने वाले विघ्नों को अवश्य ही ईश्वर से कहना चाहिए और उनसे सदा मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना करते रहना चाहिए. वे तो हमें सदा राह दिखने के लिए ही तत्पर हैं परन्तु हम ही उनसे राह नहीं पूछते हैं या वे मार्ग दिखाते हैं तो हम उसे मानते नहीं हैं, तो उसमें ईश्वर का क्या दोष है? ईश्वर तो सदा सबका कल्याण ही चाहते हैं."

 नवरात्री शाबर मन्त्र

नवरात्री आने वाली हे , उन ९ दिनों में उपासना करने के लिए एक शाबर मन्त्र दे रहा हु । बहुत सारे लोगो को संस्कृत स्तोत्र पढने नही आते । वो सभी लोग इस मन्त्र का जप करे । ये शाबरी मन्त्र प्रभावी हे। ........
** भगवती काली की कृपा-प्राप्ति का मन्त्र **
“ॐ सत् नाम गुरु का आदेश। काली-काली महा-काली, युग आद्य-काली, छाया काली, छूं मांस काली। चलाए चले, बुलाई आए, इति विनिआस। गुरु गोरखनाथ के मन भावे। काली सुमरुँ, काली जपूँ, काली डिगराऊ को मैं खाऊँ। जो माता काली कृपा करे, मेरे सब कष्टों का भञ्जन करे।”

सामग्रीः लाल वस्त्र व आसन, घी, पीतल का दिया, जौ, काले तिल, शक्कर, चावल, सात छोटी हाँड़ी-चूड़ी, सिन्दूर, मेंहदी, पान, लौंग, सात मिठाइयाँ, बिन्दी, चार मुँह का दिया।

विधिः पहले उक्त मन्त्र को कण्ठस्थ कर ले। शुभ आसन पर बैठने से पूर्व स्नान नित्य करे। सिर में कंघी न करे। माँ की सुन्दर मूर्ति रखे और धूप-दीप जलाए। जहाँ पर बैठे, चाकू या जल से सुरक्षा-मन्त्र पढ़कर रेखा बनाए। पूजा का सब सामान ‘सुरक्षा-रेखा’ के अन्दर होना चाहिए।

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Note - नीचे मंत्र साधनायें लिखी गई है कोई भी मंत्र साधना पढ़ने के लिये उस मंत्र पर क्लिक करे ☟

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